

दो भाग हैं - "समझना" और "करना".
हम कुछ न कुछ हर समय "कर" ही रहे होते हैं. इस तरह जीते हुए हम "कर के समझने" का प्रयास कर रहे होते हैं. विज्ञान विधि में भी "करके समझने" का सन्देश है. "practical करके देखोगे तो समझ में आएगा" - ऐसा कहते हैं. दूसरे अध्यात्मवादी विधि में भी "कर के समझने" का ही सन्देश है. "यह पूजा करो, ऐसे ध्यान करो, ऐसे दान करो - तब समझ में आएगा" - वे लोग ऐसा कहते हैं. इन दोनों के अलावा तीसरी सोच कोई अभी तक मनुष्य के इतिहास में आयी नहीं है. इन दोनों विधियों से आदमी ने खूब चल के भी देखा है. इन पर चल कर हम कहाँ पहुँच चुके हैं - यह हमारे सामने है.
इन दोनों के विकल्प में मध्यस्थ-दर्शन के प्रस्ताव में सन्देश है - "समझ के करो!"
(१) करके समझ पैदा नहीं होती. समझने से ही समझ आता है. [ इसका प्रमाण है - आदर्शवादी या भौतिकवादी विधि से करके समझ अभी तक धरती पर पैदा नहीं हुई. ]
(२) जो समझा हो, वही समझा सकता है. नासमझ समझा नहीं पाता है. [ इसका प्रमाण है - अध्यापक और माता-पिता बच्चों को समझा नहीं पाते हैं. ]
यदि यह बात हमको जब स्वयं के लिए स्वीकार होती है - कि "मैं अपने सबसे करीबी संबंधों को अपनी बात समझाने में असमर्थ हूँ!" तो स्वयं में "समझने" की ज़रुरत का अहसास होता है. अन्यथा हम अपने को पहले से ही समझा हुआ माने रहते हैं. इस तरह समझने का रास्ता अपने लिए बंद किये रहते हैं.
तो मूल मुद्दा "समझना" है. समझने के बाद "करना" स्वयं-स्फूर्त होता है. समझने से पहले "करना" किसी न किसी आवेश या दबाव वश ही होता है. आवेश और दबाव में हम यदि कुछ भी करते हैं, उससे समस्या ही हाथ लगती है, समाधान हाथ लगता नहीं है. सभी आवेश भ्रम वश ही होते हैं.
समझ आवेश से मुक्ति है. समझ के "ठन्डे-दिमाग" से "करना" बनता है - जिससे समाधान ही जीने में प्रमाणित होता है.
समझ को स्वत्व बनाने के लिए मध्यस्थ-दर्शन का अध्ययन के लिए एक प्रस्ताव है.
समझ जब तक स्वत्व नहीं बनी है - तब तक अध्ययन है.
यह अध्ययन-क्रम में की गयी प्रस्तुति है.