Saturday, November 14, 2009

"मानना नहीं जानना है ..."


आपके सामने एक प्रस्ताव है आपको मानना नहीं केवल जाँचना है।
* जैसे - आस्तिक और नास्तिक दोनों में क्या समानता है?
मानना भी एक "मान्यता" है और न मानना भी एक "मान्यता"है।
*जानने के लिए कुछ चीजों को जाँचना है और आदमी के पास वो क्षमता है कि वह चीजों को जान सकें।
*"निरीक्षण अर्थात् स्वयं में जाँचना "
हर चीज के लिए अपने भीतर से एक आवाज या स्वीकृति या अस्वीकृति आती है जैसे किसी आदमी को यह सिखाना नहीं पड़ता कि
"सुख क्या है या दुःख क्या है?"
वह पहचान पाता है या कोई faculty हमारे पास पहले से है जिससे हम चीजों को जाँच पाते हैं। अभी हम इसको एक दूसरा नाम देते हैं "सहज स्वीकृति "
अब आप इन्हें जाँचिये:-
*सभी सम्मानपूर्वक जीना चाहते हैं।
*सभी समृधिपूर्वक के साथ जीना चाहते हैं।
*कोई भी समस्या के साथ जीना चाहते हैं।
*कोई भी समस्या के साथ जीना नहीं चाहते।
=> क्या किसी ने यह सर्वे करके देखा है कि कौन - कौन सम्मानपूर्वक या सुखपूर्वक जीना चाहते हैं?
हमारे भीतर से आवाज आती है सभी ऐसा ही जीना चाहते हैं।
=> कहने का आधार क्या है? कि सभी ऐसे ही हैं वह क्या चीज है? जिससे हम ऐसा जाँच पाते हैं
इससे यह समझ आया कि सबमें कुछ तो एक ऐसी चीज है।
"पर वह क्या?"

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