Monday, November 16, 2009

"मानवकृत व्यवस्था या अव्यवस्था..."



अब चलिए दूसरी अवस्था पर गौर करते हैं .......

मानव किसी परिवार में है परिवार में ही पैदा होता है और वह परिवार किसी समाज से जुड़ा हुआ है व समाज किसी मानवकृत व्यवस्था से जुड़ा है जैसे शिक्षा व्यवस्था, राजनीति व्यवस्था और धार्मिक व्यवस्था आदि।


एक परिवार में एक बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता जाता है .... अब यहाँ पर एक प्रश्न आपसे - "बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ साथ माता-पिता व शिक्षकों के प्रति उसका सम्मान बढ़ रहा है कि घट रहा है? " ऐसा हम चाहते तो नहीं पर सामान्य रूप से यह घटित हो रहा है। बच्चे को लगता है माता -पिता उसे समझ नहीं पा रहे हैं या generation gap या बहुत सारी इस प्रकार की बातें, परिवार को लगता है कि उम्र बढ़ने के साथ यह बिगड़ रहा है।


चलिए अब परिवार और समाज के बीच संवाद को देखते हैं, कैसा है?.....


समाज से पूछते हैं ये सब समस्या किसके कारण है? जवाब आएगा -"ये सब परिवार के कारण है "


और परिवार को क्या चाहिए? सब कुछ ठीक हो, रोड ठीक हो, भ्रष्टाचार न हो, राजनीतिक तंत्र दुरुस्त हो।
पर करूँगा क्या ? बस मेरे बीवी और बच्चे। परिवार समाज को दोषी ठहरता है।
अब चलिए आदमी और समाज के बीच के सम्बन्ध देखते है।


"चाहे स्नातक हो , पी.एच.डी.किया हो इनसे पूछो कि आप समाज से क्या सम्बन्ध महसूस करते हैं? जो आपके जिन्दगी का हिस्सा है?
सामान्य रूप से यह उत्तर मिलेगा "कोई लेनदेन नहीं !"


अब कुछ और छोटी बातों पर गौर करतें हैं।
=> जब आप नशा करते हैं मसलन सिगरेट, तम्बाकू और शराब , तो आप क्या कहते हो ? कोई बात नहीं सब चलता है....
और अगर बच्चा करे तो आप मना करोगे !
अरे जब कोई चीज ठीक है तो बच्चा तो करेगा ही ना !
=> मै जिस परिवार में जीता हूँ आपस में बढ़िया तालमेल होना चाहिए।
और अभी की परिस्थितियों में ?
"तो हम एक छत के नीचे जीतें हैं कि रहते हैं ?"


परिवार और व्यवस्था ,समाज और व्यवस्था इनके बीच देखा जाए तो वही गहरे सवाल।
"शुरू में कुछ लोग मिलकर एक व्यवस्था बनाते हैं ताकि परिवार ठीक से चल सके बाद में यह व्यवस्था इतनी बड़ी और हावी हो जाती है कि वह समाज को चलाती है। "
अब ऊपर चित्र को देखें :-
दो स्थितियाँ दिखाई देती है -
=> एक तरफ मानव का और जड़ प्रकृति का सम्बन्ध ,
=> दूसरी तरफ मानव का मानव के साथ सम्बन्ध
इन दोनों स्थितियों को देखने पर क्या नज़र आता है?
"मानव कि भूमिका जहाँ से शुरू होती है वहां से सारी समस्या आ खड़ी होती है।"

2 comments:

संजय भास्कर said...

EK ACHHI JAANKARI KE LIYE DHANYAWAAD

सुलभ सतरंगी said...

आपके ब्लॉग पर आना सुखद रहा. चिंतन जारी रखिये. सुधि पाठक जरुर अनुसरण करेंगे.
धन्यवाद!

-सुलभ