Sunday, January 21, 2018

"शिक्षा" शब्द को लेकर मध्यस्थ दर्शन वाङ्ग्मय में आये सन्दर्भ

परिभाषा: 
  • शिष्टता पूर्ण दृष्टि का उदय का प्रक्रिया।
  • अस्तित्व में जीवन सहज मूल्य, मानव मूल्य, व्यवसाय मूल्य, स्थापित मूल्य एवं शिष्ट मूल्य के प्रति निर्भ्रम जानकारी सहित व्यवसाय, व्यवहार चेतना की परिष्कृति|  (परिभाषा संहिता: संस्करण: 2012 : मुद्रण: 2016, पेज नंबर:219)
सन्दर्भ: परिभाषा संहिता (संस्करण: 2012 : मुद्रण: 2016, पेज नंबर:)
  • उन्मादत्रय शिक्षा - लाभोन्मादी अर्थशास्त्र, भोगोन्मादी समाज शास्त्र और कामोन्मादी मनोविज्ञान का प्रवर्तन क्रिया कलाप। (पेज नंबर: 48 )
  • मानवीय शिक्षा  - अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन-जागृति रासायनिक एवं भौतिक रचना, विरचना का अध्ययन। 
          - अवधारणा सहित बौद्धिक विशिष्टता सहज सहअस्तित्व पूर्ण, विश्व दृष्टिकोण की क्रिया शीलता।
          - सर्वतोमुखी समाधान और प्रामाणिकता का वर्तमान और उसकी निरंतरता। (पेज नंबर: 151)
  • शिक्षा नीति - सहअस्तित्व बोध, जीवन बोध, मानवीयतापूर्ण आचरण बोध सहित मानव लक्ष्य बोध, जीवन मूल्य बोध, लक्ष्य सफलता के लिए निश्चित दिशा बोध कराने के साथ  -  साथ स्वयं में विश्वास श्रेष्ठता का सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन व्यवहार में सामाजिक, उत्पादन में स्वावलंबन का बोध सर्व सुलभ होना। यहाँ बोध का तात्पर्य जीवन में समझने, स्वीकारने से है| (पेज नंबर:219 )
  • शिक्षण - शिक्षापूर्ण दृष्टि सहज विकास, जागृति की ओर दिशा, अध्ययनपूर्वक यथार्थ बोध निपुणता कुशलता, पांडित्य सहज शिक्षण। (पेज नंबर:219)
  • शिष्य- जिज्ञासु, मानवीय शिक्षा संस्कार को ग्रहण करने के लिए तत्पर। (पेज नंबर: 219)
  • शिक्षा संस्कार  - ज्ञान विवेक विज्ञान सहज बोध होना। (समझ में आना, स्वीकार होना ) (पेज नंबर:219)
(शिक्षा को लेकर मध्यस्थ दर्शन वांग्मय में आये सन्दर्भों को निम्न क्रम से संकलित किया गया है।  नीचे दिये गए प्रत्येक लिंक पर जाकर आप सूचना प्राप्त कर सकते हैं।)
  1. मानव व्यवहार दर्शन 
  2. मानव कर्म दर्शन 
  3. मानव अभ्यास दर्शन
  4. मानव अनुभव दर्शन
  5. समाधानात्मक भौतिकवाद
  6. व्यवहार जनवाद
  7. अनुभवात्मक अध्यात्मवाद
  8. व्यवहारवादी समाजशास्त्र 
  9. आवर्तनशील अर्थशास्त्र
  10. मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान
  11. मानवीय संविधान सूत्र व्याख्या
  12. जीवन विद्या –एक परिचय 
  13. विकल्प 
  14. जीवन विद्या- अध्ययन बिन्दु 
  15. मानवीय आचरण सूत्र 
  16. संवाद- 1  
  17. संवाद-2
  18. श्री ए. नागराज जी द्वारा दिया गया पाठ्यक्रम
  19. चेतना विकास मूल्य शिक्षा का लघु प्रस्ताव (मानवीय शिक्षा-नीति का प्रारूप)
  20. 10 सोपानीय व्यवस्था के अंतर्गत शिक्षा संस्कार
  21. "शिक्षा" पर केन्द्रित मुख्य बातें (मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद) वाङ्ग्मय में से)  
नोट- (सभी संदर्भ संबन्धित पुस्तकों के PDF से लिए गए हैं कोई भी अंतर होने पर कृपया मूल वाङ्ग्मय को ही सही माना जाए। ) 

स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज

Wednesday, September 29, 2010

कार्य और व्यवहार

एक ने कहा जी कर देखना....
तो हम चीजों को जांचेंगे, जी कर देखने का मतलब है.... कार्य और व्यवहार
व्यवहार (Behaviour)-
मानव का मानव के साथ सुख़ की अपेक्षा में किया गया श्रम। (इसे जाँचें. Universality को जाँचना है )
इसे जाँचें...
जाँचिये ऐसा है कि नहीं? अपने भीतर ही झाँकिये, एक एक लाईन आपकी जिंदगी का Explanation है इसलिए जांचने का काम गहराई से किया जाये।
एक सूत्र है लिख लीजिये.....
गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया रहता है "
गुरु मतलब बड़ा, लघु मतलब छोटा और मूल्य मतलब सुख़। २०,००० की नौकरी में २००० वाला शामिल है, तो मुझको बड़ा सुख़ मिलता है तो मैं छोटी चीजों के पीछे क्यों भागूँगा?
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है या कुछ पाने के लिए कुछ invest करना पड़ता है।
कार्य (Work) -
मानव का शेष प्रकृति (मनुष्येत्तर प्रकृति ) के साथ आवश्यक किया गया श्रम।
(Behaviour is towards happiness, work is getting towards the physical things, mainly we are talking about production (material) activity. )
व्यवहार - मानव का मानव के साथ
कार्य- मानव का Non human के साथ
व्यवहार का सारा मतलब सुख़ पाने के लिए है , कार्य का सारा मतलब physical thing/ सुविधा प्राप्त करने के लिए )
आदमी की जिंदगी की सारी उपलब्धियों का Nutshell कहें तो केवल एक शब्द "स्वयं के प्रति के विश्वास"।
मैं बहुत Power चाहता हूँ, मैं बहुत पैसा चाहता हूँ, मैं बहुत नाम चाहता हूँ, मैं बहुत ज्ञान चाहता हूँ ....
आख़िरकार सब कुछ यह है ..."मेरे भीतर जो अधुरापन है मेरे भीतर जो खालीपन है या जो विश्वास की कमी है या जो डर है, insecurity है मैं उससे मुक्त हो जाउँ।
सारा मामला इतना ही है मैं अपने अधिकार पे जीता हूँ तो स्वयं के प्रति विश्वास को पाता हूँ।
अभी वर्तमान में, हमारा जीना स्वयं के अधिकार पे नहीं है।
एक तरफ या तो यंत्र के अधिकार पे है विज्ञान ऐसा बोलता है instrument ऐसा कहता है या वो किसी शास्त्र के आधार पर है वेद ऐसा बोलता है, गीता ऐसा बोलती है.......
मैं भी कुछ बोल सकता हूँ ऐसा space बहुत कम है।
समझने के लिए ये ४ अवस्थाएँ हैं प्रकृति अपने- आप में/ स्वयं में एक व्यवस्था है, हर ईकाई स्वयं में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदार है, समझने का unlimilted potential मेरे पास है और हर आदमी के भीतर inherent capability है कि वो चीजों को समझ सके, जाँच सके।
और उसके भीतर से यह आवाज़ आती है हाँ ये तो ऐसा ही है। It is like this only. "ये ऐसा ही है वह पहचान पाता है" इस क्षमता को हम इस्तेमाल कर सकें और अपने अधिकार पे जीने की जगह में आ सकें।
कार्य सही है तो इसका cross check क्या होगा?
यदि कार्य सही है तो परिवार में समृधि (Prosperity in family) और प्रकृति में संतुलन (Balance in nature) होगा।
इससे ज्यादा क्या हो सकता है इससे कम में क्या चलेगा? तो इससे ज्यादा कुछ होता नहीं इससे कम में कुछ चलता नहीं, इतना चाहिए।
यदि व्यवहार सही है तो उसकी पहचान क्या होगी?
दोनों पक्षों का सुख़।

अभी हम अच्छा व्यवहार करते हैं और सामने वाले का response नहीं है तो मुझे क्या लगता है? क्या कमी रह गई?
मुझसे कोई गलती हो गई क्या? Everyone has same problem.
इस धरती पर कोई भी आदमी बिना payment के काम नहीं करता है। एक माँ भी अपने बच्चे की सेवा क्यों करती है? उसको क्या payment मिलता है? बच्चे की मुस्कराहट माँ के लिए payment है।

Thursday, September 23, 2010

रास्ता क्या है?

करके समझना बहुत महंगा है। जैसे एक, करके समझना- अच्छा मकान हो जाये जिंदगी बन जाये।
इसको पूरा करने में कितना समय लगेगा? ५ साल, ६ साल या फिर १० साल। यह करके समझ आया कि मुझे यह नहीं चाहिए था।
फिर और कोई मान्यता!
इस प्रकार एक एक मान्यता हमारे जिन्दगी के कई साल ले लेती है जब हम वहां पहुँचते हैं तो हमें पता चलता है कि यह वह नहीं है!... या यह पर्याप्त नहीं है।
तो इस तरह hit n trial करके जिन्दगी को जिया जाये या एक सुनिश्चित मार्ग पर चलकर जिन्दगी जिया जाये। समझकर जीना भी जिन्दगी जीने का राजमार्ग है। सारे समय और क्षमता को बचाकर हम सुन्दर तरीके से जी सके और मुझको वहां पहुँच के लगे मैं यहीं पहुंचना चाहता था।
यही है! यही है! यही है!......

और उसको गुणित भी किया जा सकता है क्योंकि जब तक कोई चीज गुणित नहीं होती हमारे भीतर वह विश्वास नहीं आता है कि यह सही है। सही होगी तो सबकी जरूरत होगी। सबकी जरूरत होगी तो गुणित होगी।

Tuesday, September 21, 2010

जीना कैसा होगा?

अधिमुल्यन, अवमूल्यन या अमुल्यन करते हैं तो इसके आधार पर हमारा जीना कैसा होगा?
कठिन होगा, सामंजस्य नहीं होगा। ना आदमी के साथ सामंजस्य होने वाला है ना बाकि चीज के साथ।
सोम भैय्या ने आगे कहा -
अधिमुल्यन, अवमूल्यन और अमुल्यन को कहा D.P.T. "दुःख पाया टूरिस्ट" :)
हम सभी यात्री हैं सुख़ की तलाश में निकले हुए। हम जो चीज जैसी है उसको वैसा नहीं पहचान पाते, सामंजस्य पूर्वक नहीं जी पाते हैं तो दुःख पाते हैं, परेशां होते हैं।
इसको हमने सम्मानजनक भाषा दे दिया "Struggle" और इसे परिभाषित भी कर दिया।
Struggle मेरी और दूसरों की मूर्खताओं का परिणाम है प्रकृति में कोई struggle नहीं है।
हर इकाई स्वयं में व्यवस्था है समग्र व्यवस्था में भागीदार है।
सारा Struggle आदमी आदमी के बीच है,
क्या है बीच में?
"आप मुझको नहीं समझते हो?"
"मैं आपको नहीं समझता हूँ इतना ही Struggle है।
तो एक बात समझ में आई....... समझ सबके लिए एक है। चार अवस्थाओं का समझना ही समझ है।
अस्तित्व अपने आप में एक सह अस्तित्व है। हर इकाई अपने में व्यवस्था है समग्र व्यवस्था में भागीदार है और नहीं समझ पाते हैं तो अधिमुल्यन, अवमूल्यन और अमुल्यन करते हैं और परिणाम में दुःखी होते हैं।
तो क्या है रास्ता?
(मध्यस्थ दर्शन पर आधारित शिविर -श्री सोम त्यागी द्वारा प्रस्तुत)

Monday, May 31, 2010

समाधान, भ्रम/ भ्रान्ति

समाधान-
जो चीज जैसी है उसे वैसा ही जानना समाधान है।
भ्रम/भ्रान्ति-
जो चीज जैसी है उसे अन्यथा मान लेना।
अन्यथा के ३ प्रकार हैं:-
  • जो जैसा है उससे अधिक मान लेना - अधिमुल्यन (Overevaluating)
जैसे "बाप बड़ा ना भैय्या सबसे बड़ा रुपैय्या " यह क्या है ? पैसे का अधिमुल्यन
  • जो जैसा है उससे कम मान लेना -अवमूल्यन (Under evaluating)

कुछ देर बाद किसी ने कहा "ये पैसा ही सारे झंझट की जड़ है !" यह क्या हो गया ? अवमूल्यन।

  • जो जैसा है उसका कुछ का कुछ मान लेना - अमुल्यन (Evaluating something else)

किसी से गलती हुई हमने कहा "तुम गधे हो.." ये क्या हो गया अमुल्यन। मानव से सीधे गधे बना दिया।

"तुम तो राजा हो। ये भी अमुल्यन हुआ।

तो ऐसे ही लेकिन इन तीनों का परिणाम क्या आने वाला है?
जो चीज जैसी है उसको वैसा ही जानने के बजाय हम कुछ और मान लेते हैं अधिमुल्यन, अवमूल्यन या अमुल्यन करते हैं तो इसके आधार पर हमारा जीना कैसा होगा?

Saturday, February 20, 2010

"स्वयं में विश्वास और प्रयास....."

वर्तमान शिक्षा प्राप्त करने के लिए १८ और २० साल आपने अपने लगा दिए क्या अब भी हममें दो रोटी कमाने का आत्मविश्वास आ पाया है?
सोम भैया कहते हैं १८-२० साल लेकर हम (वर्तमान शिक्षा प्रणाली) उसमें दो रोटी कमाने का आत्मविश्वास नहीं आ पाता।

नौकरी लग गई तो हमको लगता है कुछ हो गया नहीं मिले तो road पर खड़ा रहे देखिये उसकी क्या हाल है ?

शायद ये मै नहीं कह रहा है कि सब कुछ गलत है लेकिन इसमें काफी gaps है उन gaps को भरने की जरुरत है। अब यदि हम देखे तो मै आपके सामने एक question रखता हूँ समझ का content सबके लिए एक है या अलग है।

समझ की विषय वस्तु सबके लिए एक है।

सोम भैय्या कहते हैं जितने लोग इस धरती से चले गए उनके लिए भी यह चार अवस्थाएं थी हमारे लिए भी यह चार अवस्थाएं थी जितने लोग और पैदा होने होने वाले हैं उनके लिए भी यही चार अवस्थाएं हैं। यही समझने का content है।

और ये चारों अवस्थाएं हिन्दू धर्म के हिसाब से काम करते हैं या मुस्लिम धर्म के हिसाब से?

कोई धर्म को follow नहीं करती है। ये प्रकृति धर्म को follow करते हैं।

एक परमाणु हिन्दू है कि मुस्लिम झंझट नहीं है एक परमाणु परमाणु है स्वयं में एक व्यवस्था है समग्र व्यवस्था में भागीदार है।

एक नीम का पेड़ चाहे हिन्दू के घर हो या मुस्लिम के घर में है। उसका एक निश्चित आचरण है। एक लोहे को हिन्दू बनाये कि मुस्लिम बनाये उसका एक निश्चित आचरण है। हर चीज अपने निश्चित आचरण के साथ है यह हमारी स्वीकृति बनती है। इस आधार पर हम इस पर विश्वास कर पाते हैं।
लोहे पर हमको बहुत विश्वास है लोहे का मूड ख़राब हो जाये। आज रविवार है आज नहीं उठाऊंगा इधर हमको विश्वास है। आदमी का कब मूड ख़राब हो जाये कब क्या करेगा? यह बिलकुल एक दूसरी बात है।
समझ में आता है कि हम विश्वास कहाँ कर पाते हैं? जड़ वस्तुओं पर, क्यों?

क्योंकि उनका आचरण निश्चित है तो जिसका आचरण निश्चित है हम उसके प्रति विश्वास कर पाते हैं।
क्या हम खुद पर विश्वास कर पाते हैं?

आचरण निश्चित नहीं है कभी भी जितना विचार हमको उठता है जितनी सारी इच्छाएँ हमको उठती है जिन लोगों के लिए उठती हैं। एक दिन जाकर उनको बता दिया जाये।
मेरे मन में तुम्हारे बारे में यह यह विचार आते हैं।
मेरे मन में तुम्हारे बारे में यह यह इच्छा होती है।
कैसा रहेगा?
तो मै खुद पर विश्वास कर नहीं पाता हूँ क्योंकि मुझे पता है कि मेरा आचरण निश्चित नहीं है।
मेरे भीतर कितने प्रकार की उटपटाँग बाते उठती रहती है इसलिए खुद पे विश्वास नहीं कर पाता हूँ तो सब ऐसे ही है ऐसे आदमी के साथ जीना मुश्किल है ऐसी स्वीकृति हमारी बनी हुई है।
तो अब क्या लगता है समझ सबके लिए एक ही चीज है या सबके लिए अलग अलग चीज है ?
एक ही चीज
!
फिर ये अलग अलग क्या था?
देखने का नजरिया।
कैसा?
४ अंधों ने हाथी देखा, आँख खोल के देखा होता तो पूरा हाथी जैसा है वैसा देखा होता तो हम जब दृष्टि कोण देखते हैं तो मेरी एक बात और मुझे समझ आई ये अच्छे विचार जीने के कोई काम नहीं आते हैं ये मै उस सन्दर्भ में कहना चाहता हूँ जिस सन्दर्भ में हम लोगों ने चर्चा की थी की बुरे नहीं हैं। इनको हम अच्छा लोग मान रहे थे अभी तक और हम क्या कहते हैं "अच्छे लोग तो पीसते हैं" ऐसा कुछ बोलते हैं कि नहीं?
अच्छे आदमी का तेल निकला जायेगा, अच्छे आदमी का शोषण होगा तो क्या कोई अच्छा आदमी बनना चाहेगा? और क्यों बनना चाहिए
बिलकुल नहीं बनना चाहिए और इसलिए अच्छे लोगों कि संख्या को भी देखना पड़ेगा। तो अब समझ में आया कि वो अच्छा था नहीं और जो suffer करते हैं वो इसलिए suffer करते हैं क्योंकि वे बुरों में शामिल हो नहीं सके ऐसा कहिये...अच्छे भी बन नहीं सके इसलिए बेचारा चौराहे पर खड़ा है।
इसकी पहचान ना इधर बन पाई इधर (बुरे ) आ जाता तो पहचान बनने का एक तरीका है! इधर (समझदार) हम पहुंचना चाहते हैं पहुँचने का रास्ता स्पष्ट नहीं है तो मुख्यत: अच्छा आदमी का मतलब है जिसको कोई Exploit ना कर सके वह किसी को exploit ना करता हो ऐसी हम सारी प्रार्थनाओं में भी बोलते हैं।
तो अब यह समझ में आता है जिसको हम अभी तक अच्छा आदमी बोल रहे थे वो अच्छा होना चाहता है अच्छा अभी है नहीं। अच्छा होने के बाद कोई दूसरा आपका शोषण कर ले कोई उद्योगपति आपको काम पर लगा ले क्योंकि हमारे भीतर भी कोई ना कोई लालच रहता है या हमारे भीतर यह स्पष्टता नहीं है कि मुझको करना क्या है?तो मै कहीं ना कहीं शामिल होऊंगा चुप तो बैठूँगा नहीं। कहीं ना कहीं शामिल होगा जिसमें वह शामिल होगा वह धरातल लाभोन्माद, भोगोन्माद और कामोन्माद का ही है।

Wednesday, February 17, 2010

कुछ प्रश्न स्वयं से करें?

* वर्तमान शिक्षा प्राप्त करने के लिए १८ और २० साल आपने अपने लगा दिए क्या अब भी हममें दो रोटी कमाने का आत्मविश्वास आ पाया है?

* अगर हमारी नौकरी चली गई तो हमारा क्या हाल होगा?

* समझ का विषयवस्तु क्या है? और क्या सबके लिए एक है या अलग -अलग?

* चार अवस्थाएं किस धर्म के हिसाब से काम करते हैं?

हिन्दू धर्म/मुस्लिम धर्म/प्रकृति धर्म

* हम जड़ वस्तुओं पर मानव से ज्यादा विश्वास कर पाते हैं क्यों?

क्या हम खुद पर विश्वास कर पाते हैं

हाँ/नहीं

नहीं? तो क्यों?

* ४ आदमी हाथी को आँख बंद करके देखा तो क्या देखा ?

* फिर से वही प्रश्न दोबारा।

समझ का विषयवस्तु सबके लिए एक या अलग -अलग।

* हम किस श्रेणी में आते हैं?

बुरे हैं/बुरे नहीं है/अच्छे हैं/समझदार हैं।

* क्यों कहा जाता है?

" अच्छे लोग पीसते हैं।"

Good People is always suffer.

* क्या स्वयं के भीतर यह स्पष्टता बन पाई है कि करना क्या है?

* चुप तो बैठना नहीं है शामिल तो होना ही है पर कहाँ हो रहे हैं?

कहीं वह धरातल लाभोंमाद, भोगोंमाद और कामोन्माद का तो नहीं?
अगर ऐसा है तो भैया अपने को संभालो।
यह जीवन दोबारा नहीं मिलने वाला अभी समझ लो।